History
दर्रा खैबर तक भगवा ध्वज फहराने वाले महान तपस्वी संघ प्रचारक
स्व. माधव राव कोण्डोपंत मुल्ये
मा० श्री माधव राव जी का जन्म 7 नवम्बर 1912 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि ज़िला अर्न्तगत “ओझरखोल" नामक गांव में एक अत्यंत निर्धन परिवार में हुआ । निर्धनता इतनी थी कि पूज्य पिता जी का साया सिर से उठ जाने पर परिवार की आजीविका हेतु उन्हें टायर ट्यूब की मुरम्मत जैसा काम करना पड़ा। एक मेधावी छात्र होने के नाते इन्होंने नागपुर से दसवीं की परीक्षा पास की। 1926 में आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक आद्य सरसंघचालक प० पू० डॉ॰ केशव राव बलिराम हेडगेवार जी के सम्पर्क में आए। उन्हीं के सानिध्य में रहकर मुल्ये जी ने राष्ट्रभक्ति व समाज सेवाव्रती बनने की दीक्षा ग्रहण की। मुल्ये जी की आंतरिक इच्छा इंजिनियर हो कर एक सफल उद्योगपति बनने की थी। डॉ हेडगेवार एक कुशल पारखी थे। वे जान गए थे कि माधव राव उत्तम श्रेणी के कुशल संगठनकर्त्ता हैं । सो डा० साहब से दिशा निर्देश पाकर उनकी प्रेरणा से वे आजीवनव्रती संघ प्रचारक बन कर कार्यक्षेत्र में उतर गए। 21 जून 1940 को प० पू० डॉ० हेडगेवार जी दिवंगत हुए और 21 जुलाई को उनके मासिक श्राद्ध दिवस पर अकेले नागपुर शाखा के 22 स्वयंसेवकों ने प्रचारक का बाना पहना। इसी अवसर पर श्री माधव राव जी को पंजाब प्रांत के कार्य हेतु प्रान्त प्रचारक नियुक्त किया गया। उस समय के पंजाब प्रान्त में वर्तमान पाकिस्तान, पूरा जम्मू-काश्मीर, पूर्वी पंजाब, हरियाणा, हिमाचल एवं दिल्ली शामिल थे। पंजाब प्रान्त प्रचारक नियुक्त होकर जब मुल्ये जी लाहौर आए तब वहां की भाषा, परिवेश, रीति रिवाजों एवं लोगों आदि सभी से अपरिचित थे। प्रकृति प्रदत्त अलौकिक प्रतिभा, पराक्रम एवं कौशल्य के बलबूते पर उन्होंने संघ कार्य को दूर-दूर तक प्रतिष्ठित कर दिया। उन्हीं के कुशल नेतृत्व में हिन्दू युवकों ने अपने पूर्वजों के राष्ट्रीय झण्डे भगवा ध्वज को एक बार फिर दर्रा खैबर तक फहरा दिया। भारत के प्रधानमन्त्री तक, जहां नहीं पहुंच पाये, माधव राव जी ने वहां (सिन्धु नदी के पार) प० पू० गुरु जी का स्वागत करने का श्रेय प्राप्त किया। उनके मार्गदर्शन में पूरे उत्तरी व श्री पश्चिमी क्षेत्रों में संघकार्य का तीव्र गति से विस्तार हुआ। उन्हीं की प्रेरणा पा कर सैंकड़ों स्वयंसेवक प्रचारक बन कर निकले।
माo श्री मुल्ये जी का जीवन राष्ट्र निर्माण कार्य में लगे हजारों संघ कार्यकर्ताओं की प्रेरणा का स्रोत हैं। उत्कट देशभक्ति, ध्येय समर्पित जीवन, कुशल संगठनकर्त्ता और देश सेवा की वह जीती जागती मूर्ति थे। वह सभी के प्रति गहरी आत्मीयता, निस्वार्थ समर्पण की प्रेरणा तथा अपने राष्ट्र के प्रति विलक्षण श्रद्धा रखने वाले थे।
व्यक्ति, समाज और राष्ट्र जीवन के परस्पर संबंधों की उन्हें गहरी समझ थी। राष्ट्र जीवन के विभिन्न आयामों का उन्हें सूक्ष्मतम ज्ञान होने के कारण उन का चिन्तन केवल भौगोलिक हीं नहीं वरन् समग्र भी था।
श्री माधव राव जी ने राष्ट्र कार्य-हित कई बार जेल यात्रा भी की। सर्वप्रथम सन् 1937 में निजाम हैदराबाद द्वारा हिन्दुओं की उपासना पद्धति के मूलाधिकार छीनने के विरूद्ध आन्दोलन में भाग लिया। फिर सन् 1938 में पूना में मुसलमानों द्वारा सोन्या मारूति (हनुमान जी) के मन्दिर में घंटी बजाने पर आपत्ति करने के खिलाफ सत्याग्रह किया (डा० साहब के साथ) । वे प्रथम प्रतिबंध (1948) तथा कश्मीर-सत्याग्रह में भी जेल गए। सन् 1970 में सहसरकार्यवाह और 1973 में सरकार्यवाह जैसा गुरुतर दायित्व श्री माधव राव जी को सौंपा गया।
एक कुशल सेनानी एवं योद्धा संघ प्रचारक श्री माधव राव जी ने 30 सितम्बर 1978 को अंतिम साँस ली और एक समर्पित जीवन अनंत में विलीन हो गया।
ऐसे श्रेष्ठ महापुरुष के प्रत्यक्ष सानिध्य से प्रेरणा पा कर उनके विचारों का प्रचार प्रसार करने हेतु मा० श्री माधव राव मुल्ये जी की पुण्य स्मृति को स्थायी बनाने के उद्देश्य से 6-9-1999 को "श्री माधव राव मुल्ये सेवा ट्रस्ट" की स्थापना जालन्धर (पंजाब) में की गई।